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परिवार में कैसे रहना चाहिए

परिवार में कैसे रहना चाहिए

जब हम एक परिवार में रहते हैं। तो हमारा जीवन एक दूसरे से जुड़ा होता है। हमारा दुख-सुख जुड़ा होता है। अगर एक परिवार में रहकर हर व्यक्ति सिर्फ अपने सुख को महत्व देगा, तो वहां पर परेशानियां शुरू हो जाती हैं। यदि हम दूसरों के सुख, दुख का भी ध्यान देंगे, तो हम भी उस परिवार में अपने जीवन में ज्यादा प्रसन्न रह पाएंगे। आज कल जब माता पिता बच्चों को कोई सुझाव देते हैं। कुछ बात बताते हैं। तो कई बार बच्चे उन बातों को नहीं समझते या बंधन को अनुभव करते हैं। पर याद रखें जब आप अपने परिवार की खुशी से अपनी खुशी को ज्यादा महत्व देंगे। तो उसका प्रभाव आपके पूरे परिवार पे पड़ने वाला है। जिस परिवार में एक दूसरे के लिए अपने सुख के त्याग की भावना है। उस परिवार में प्रसन्नता, शांति, आनंद, सदैव बने रहते हैं।एक परिवार को अच्छे से अच्छे दिलाने के लिए सबसे जरूरी है कि हम एक दूसरे की खुशियों को support करें। और अगर हम अपनी खुशियों को ज्यादा focus करेंगे। दूसरों की परवाह नहीं करेंगे। तो हमारे परिवार में प्रॉब्लम्स आना शुरू हो जाएगी।

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एक पिता ने अपने बच्चे को बड़े प्रेम से पाला। बहुत उसका अच्छा लालन पालन किया। उसकी अच्छी परवरिश की पर उसका बेटा कुछ काम नहीं करता था। उसका पिता वृद्ध आयु तक काम करता रहा। जब उस पिता की आयु बड़ी हो गई। शरीर कमजोर हो गया। तो उन्होंने काम करना छोड़ दिया। उनके बेटे ने कभी कोई काम नहीं किया था। तो जब उसके बेटे ने देखा कि पिताजी किसी काम के नहीं रहे और अब मुझे ही इनको पालना पड़ेगा। तो वो परेशान रहने लगा कि मैं खुद ही अपना ख्याल नहीं रख सकता तो अपने पिता को कहां से पालूंगा। गलत संगत में वह पहले से ही था। बुद्धि बिगड़ी हुई थी। उसने मन में ख्याल किया अगर पिता रहेंगे तो मुझे उनकी सेवा करनी पड़ेगी। उनके लिए काम करना पड़ेगा। उसने क्या किया एक ताबूत बनवाया और अपने पिता को कहा कि आप इस ताबूत में लेट जाओ मैं आपको वैध, doctor के पास ले जाता हूं। आपकी तबीयत ठीक नहीं। उसके पिता समझ गए ये क्या करने वाला है। और वह चुपचाप लेट गए। उसने उस ताबूत को एक गाड़ी में रखा। और पर्वत की चोटी पर वह गाड़ी ले आया। उसके पिता ने अंदर से आवाज दी कि मुझे बाहर निकालो मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। उसके बेटे को लगा मैं तो यहां से पिता को फेंकने की सोच रहा हूं। और यदि ये यहां से बाहर निकल गए तो भाग जाएंगे। उसके पिता ने आवाज दी कि तुम मुझे बाहर निकालो पता ही नहीं भागने वाला तुम जो बोलोगे मैं वही करूंगा। उसने वह ताबूत खोला उसके पिताजी बाहर आके कहने लगे कि इस ताबूत कि मुझे कोई जरूरत नहीं यह तुम वापस घर ले जाओ। क्योंकि जिस ताबूत में मुझे डाल के तुम यहां से फेकने आए हो। एक दिन यही ताबूत तुम्हारी औलाद के काम आएगा। तो ये घर ले जाओ। जब उसने यह बात सुनी कि मेरी औलाद भी मेरे साथ यही काम कर सकती है। तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। और अपने पिता के चरणों में गिर के माफी मांगने लगा। जैसे छोटे बालक की जिम्मेदारियां माता-पिता की होती है। वैसे ही वृद्ध माता पिता की जिम्मेदारियां बच्चों की होती है। जैसे छोटा बालक depend होता है। वैसे ही वृद्ध माता पिता भी depend होते हैं।

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जो लोग अपने माता पिता को उनकी वृद्धावस्था में असहाय अवस्था में छोड़ देते हैं। उनका कोई भी शुभ कर्म उन्हें कोई फल नहीं देने वाला। जिनके घर में उनके वृद्ध माता पिता दुखी रहते हैं। वहां भगवान, देवता कोई उनकी पूजा को स्वीकार नहीं करते। इसलिए अपने माता-पिता का आदर करेंगे। अपने माता पिता को प्रसन्न रखेंगे। तो आप पर भी देवीय कृपा बनी रहेगी। परमात्मा की कृपा बनी रहेगी। वेदों में शास्त्रों में भगवान से भी पहले माता पिता का दर्जा स्थान है। तो सबसे पहले आप उनकी आदत, सम्मान करना शुरू करें। हम अपने स्वार्थ में इतने अंधे न हो जाए कि हमें दूसरों के सुख, दुख दिखाई ना दे। कई बार बच्चे कहते हैं। हम यह करना चाहते हैं। वह करना चाहते हैं। पर माता-पिता हमें उस चीज की मंजूरी नहीं देते। इतना याद रखें कि जब माता-पिता आपको किसी चीज के लिए रोकते हैं। तो इतना पक्की बात है कि वो आपका बुरा नहीं चाहते। क्योंकि उन्होंने आपकी खुशियों के लिए अपने जीवन में बहुत कुछ त्याग किया है। और माता पिता की वजह से पेरेंट्स की वजह से आपका अस्तित्व है। तो आप कुछ भी करके जो उनका आप पर ऋण है वह वैसे भी नहीं उतार सकते। माता का ऋण होता है। पिता का ऋण होता है। गुरु का ऋण होता है। देवताओं का ऋण होता है। पर माता-पिता का ऋण उतारा नहीं जा सकता कभी। क्योंकि आपका होना ही उनकी वजह से है। तो यदि उनकी खुशी के लिए आप कोई सैक्रिफाइस भी करते हैं। अपनी कोई खुशी, कोई सुख छोड़ते भी हैं। तो बदले में आपके परिवार में, आपके जीवन में हजार खुशियां आपको मिलेगी। कई बार हम छोटी खुशी की वजह से बड़ी बड़ी खुशियों को अपने जीवन में आने से रोक लेते हैं। एक बात याद रखें चाहे पेरेंट्स हों, चाहे बच्चे हों, चाहे आपके परिवार का कोई भी रिश्ता हो, पति पत्नी का हो, भाई बहन का हो, कोई भी आपके परिवार का रिश्ता हो, जिस परिवार में त्याग है वह खुश एवं प्रसन्नता से रहेगा। जिस परिवार में लोग एक दूसरे के लिए सद्भाव रखते हैं। एक दूसरे के सुख की, खुशी की, परवाह करते हैं। उस परिवार में कभी क्लेश नहीं होता। क्लेश वही होता है, जहां हमारा स्वार्थ, हमारा लोभ,। हमारी आशक्ति दूसरों के सुख, दुख को नहीं देखती वहीं पर हमारे परिवार परेशानीयां में शुरू हो जाती है। तो घर के जो बच्चे हैं अगर माता-पिता किसी चीज के लिए रोकें भी तो एक बात याद रखे उन्होंने हमारे लिए हजार कुर्बानिया दी है और यह तो बहुत छोटी बातें हैं। अगर उनकी खुशी के लिए हम थोड़ा सा अपनी खुशी को छोड़ भी देते हैं। त्याग भी करते हैं तो भी जो हमने उनसे पाया है। जो उन्होंने हमारे लिए किया है। हमारा त्याग कुछ भी नहीं। तो एक ये मंत्र सीख लें। अपने परिवार की खुशी के लिए अपने सुख से ज्यादा अपने परिवार के सुख को महत्त्व दें। बच्चे अपने माता-पिता का सम्मान करना सीखें। उनकी बात का आदर करना सीखें। और बड़े बच्चों के प्रति अच्छी भावनाएं रखें। तो हमारे परिवार में हमेशा प्रसन्नता आनंद बना रहेगा।।

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